
अगर मन में कुछ करने की चाह हो, आंखो में लगन हो और हौसलों में उड़ान और हिम्मत में उफान हो तो इस संसार में कुछ भी करना मुश्किल नहीं है बस जरूरत होती है अपने छुपी हुई शक्तियों को पहचानने की और जज्बे को बनाए रखने की।
अगर कोई वास्तव मै देश समाज के लिए कुछ करना चाहता है आम लोगों के दुख दर्द को दूर करना चाहता है तो आईएएस से अच्छा और कोई विकल्प उसके लिए नहीं हो सकता।
आज हम आपके सामने ऐसे ही कुछ आईएएस की ज़िन्दगी के संघर्षों कि कहानियों को साझा करेंगे जिससे आप इन सभी से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में कुछ अच्छा और बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकें।

1- आईएएस विजय वर्धन
"लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती" ये कहावत जैसे इन्हीं के लिए कहीं गई रही हो क्यूंकि इनकी ज़िन्दगी में असफलताओं की तो लाइन लगी पड़ी है इन्होंने 30 से ज्यादा सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं दी और सभी में असफल होते गए, अगर इनके पास कुछ बचा रहा तो वो था इनका आत्मविश्वास और इनकी मेहनत करने की क्षमता,
जिसके बदौलत इन्होंने अंत में यूपीएससी जैसे कठिन परीक्षा को पास किया,और मात्र पास ही नहीं 104 रैंक के साथ ये टॉपर की श्रेणी में आते हैं
सोचिए अगर कुछ असफलताओं के बाद ये हार मान लेते तो क्या ये कभी आईएएस बन पाते कभी नहीं, इसलिए हमे कभी हार नहीं माननी चाहिए और अंतिम प्रयास तक पूरे ऊर्जा के साथ संघर्ष करना चाहिए।

2- आईएएस वैभव छाबरा
"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" इसी कहावत को सच कर दिखाया है आईएएस वैभव छाबरा ने,
दरअसल बात ये है कि वैभव आईएएस की तैयारी कर रहे थे और मात्र कुछ ही महीने रह गए थे उनके परीक्षा मे तभी एक ऐक्सिडेंट में उनकी पीठ में क्रैक हो जाने के कारण उनको हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा और करीब 6 महीनों तक उनको बेड पर ही रहना पड़ा जिससे उनकी मानसिक स्थिति भी कुछ बिगड़ने लगी थी, लेकिन ये बताते हैं की जब इनको कोई भी परेशानी हुई इनकी माता ने इनका पूरा साथ दिया और उन्हीं के समझाने से ये फिर से पढ़ाई में जुट गए और बेड पर रहते हुए भी इन्होंने तैयारी जारी रखी और साल 2018 में यूपीएससी का एग्जाम दिया और 32वीं रैंक हासिल की।
सोचिए अगर ये भाग्य को दोष देते, अपनी किस्मत को कोसते तो क्या कभी इस मुकाम को हासिल कर पाते,क्या कभी अपने मां बाप का सपना पूरा कर पाते?

3- नेहा यादव
"आसमान में भी कर दोगे छेद,एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों" बिल्कुल सही बैठती है ये कहावत यूपीएससी टॉपर नेहा यादव पर,
आज के समय में जहां युवाओं को तमाम सुख सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है और हर समय उनकी जरूरतों को पूरा करने की लुरी कोशिश की जाती है लेकिन फिर भी युवा अपनी ऊर्जा कहीं और गलत तरीकों से खत्म कर रहा होता है ऐसे में नेहा ने आईएएस की तैयारी करती गई और सबसे अच्छी बात ये है कि इन्होंने कोई कोचिंग या किसी से कोई सहायता भी लिए बिना इस एग्जाम को पास किया,
नेहा अपने खर्चों और पढ़ाई के लिए नौकरी भी करती थी,और फिर नौकरी के बाद पढ़ाई करती थी और इन्हीं संघर्षों को करते हुए साल 2018 की यूपीएससी की परीक्षा में उन्होंने 414वीं रैंक हासिल की।

4- सी. वनमती
यूपीएससी कभी किसी की कद, रूप, रंग देखकर नौकरी नहीं देता वो तो मात्र मेहनत, लगन और कठिन परिश्रम वालों को देश की सेवा के लिए चुनता है को की ईमानदारी और सच्चाई के साथ देश की आम जनता की सेवा कर सकें,
और आईएएस जैसी उच्च शिखर पर पहुंचने वाले बहुत संघर्षों से होकर गुजरते हैं कठिन परिश्रम और पुरुषार्थ सिद्ध करने के बाद ही उस शिखर को प्राप्त किया जा सकता है
सी. वनमती का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता है बचपन में उनको भैंस और जानवरों को चराने के जाना पड़ता था और खेतों में भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी तब जाकर कहीं दो वक़्त की रोटी नसीब होती थी
लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी गरीबी को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया और अंत में आईएएस की परीक्षा में शामिल हुईं लेकिन पहली बार असफल हो गई लेकिन वो हार नहीं मानी और अधिक प्रयास के साथ दूसरी बार फिर यूपीएससी की परीक्षा में शामिल हुईं और साल 2015 की इस परीक्षा में आईएएस बनने का सपना पूरा करके है मानी।

5- आईएएस शशांक मिश्र
"सफलता तो मेहनत कि दासी है" ये कहावत शशांक के ऊपर बिल्कुल सही बैठती है क्यूंकि इन्होंने सफलता पाने के लिए ना सिर्फ कठिन परिश्रम किया बल्कि अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया,और अपने आप को यूपीएससी के प्रति समर्पित कर दिया और इसी मेहनत और बलिदान का फल है कि शशांक को 2005 में यूपीएससी में पांचवीं रैंक हासिल हुई,
प्रथम प्रयास में शशांक को असफलता हाथ लगी लेकिन दूसरे प्रयास में शशांक ने सब कुछ लगा दिया और पांचवीं रैंक हासिल की,
जब ये इंटरमीडिएट में पढ़ते थे तभी इनके पिताजी का निधन हो गया और परिवार का सरा बोझ शशांक के कंधों पर आ गया,
बाहर रहने के इनके पास पैसे नहीं थे जिससे इनको ट्रेन के डिब्बे में रहकर पढ़ना पड़ा और कई दिन तो खाना ना मिल पाने के कारण इनको बिस्किट खा कर काम चलाना पड़ता था लेकिन इनकी मेहनत और इनका बलिदान तब सफल हो गया जब पता चला कि यूपीएससी में शशांक की पांचवीं रैंक अाई है, सलाम है ऐसे जज्बे को।
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