आज यानी 24 जुलाई को भारत का इनकम टैक्स डे है.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कई जानकार यह सवाल उठाते रहे हैं कि देश में पर्सनल इनकम टैक्स की जरूरत क्या है और इसे खत्म कर देना चाहिए. तमाम जानकार यह भी कहते हैं कि भारत में इनकम टैक्स देने वाले को कोई प्रोत्साहन नहीं है बल्कि उसे प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है. आज आज यानी 24 जुलाई को आयकर दिवस पर एक्सपर्ट्स से जानते हैं कि क्या पर्सनल इनकम टैक्स की व्यवस्था को खत्म करना संभव है, क्या है इसके नफा-नुकसान?
कब से हुई इनकम टैक्स व्यवस्था की शुरुआत
भारत में आयकर व्यवस्था को लागू हुए 160 साल हो चुके हैं. आधुनिक भारत में इनकम टैक्स व्यवस्था की शुरुआत सबसे पहले ब्रिटिश सरकार की कौंसिल ऑफ इंडिया के फाइनेंशियल मेंबर जेम्स विल्सन ने 24 जुलाई, 1860 को की थी. कहा जाता है कि 1857 की प्रथम क्रांति से ब्रिटिश सरकार को जो घाटा हुआ उसकी भरपाई के लिए इसकी शुरुआत हुई. इसके बाद इसमें 1918, 1922 और 1961 में कई बदलाव किए गए. अभी जो कानून है उसके ज्यादातर प्रावधान इनकम टैक्स एक्ट 1961 के हैं.
इनकम टैक्स के दो हिस्से हैं
इनकम टैक्स के दो हिस्से होते हैं. एक पर्सनल इनकम टैक्स जो आम करदाता से जुटता है और दूसरा कॉरपोरेट टैक्स जो कंपनियों की आय पर लिया जाता है. इनकम टैक्स कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. यह सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य है. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 में कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह 12.33 लाख करोड़ रुपये का हुआ था, जिसमें कॉरपोरेट टैक्स 6.78 लाख करोड़ रुपये और पर्सनल इनकम टैक्स 5.55 लाख करोड़ रुपये का था.
इस टैक्स संग्रह से ही सरकार ज्यादा से ज्यादा कल्याणकारी योजनाएं चलाती है. इसके अलावा टैक्स राजस्व से ही सरकार सभी नागरिकों को चिकित्सा, शिक्षा, बिजली, मकान, राशन, पुलिस, सुरक्षा, सड़क जैसी जरूरी सेवाएं मुहैया करती है.
इन देशों में नहीं लगता है इनकम टैक्स
यूएई, मोनाको, बहरीन, ब्रुनेई, केमन आइलैंड, बहामास, बरमूडा जैसे करीब 15 देशों में इनकम टैक्स जैसी कोई चीज नहीं है. लेकिन ये देश तेल या अन्य स्रोतों, संसाधनों से भारी कमाई करते हैं और दूसरे ये बहुत छोटे देश हैं. ओईसीडी ने भी इस तरह का प्रयास शुरू किया है कि हर देश कम से कम टैक्स लगाएं. सिंगापुर, चीन जैसे देशों में इनकम टैक्स पर निर्भरता कम है.
क्या होगा फायदा
कॉरपोरेट पर लगने वाला इनकम टैक्स तो जरूरी है, लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी जैसे राजनेता और कई एक्सपर्ट अक्सर यह मांग करते रहे हैं कि आम जनता पर लगने वाले पर्सनल इनकम टैक्स को खत्म कर देना चाहिए. सुब्रमण्यम स्वामी का तो कहना है कि यह अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए जरूरी है. उनका तर्क है- इकोनॉमी की समस्या यह है कि मांग की कमी है, इसलिए इनकम टैक्स खत्म करने से लोगों के हाथ में पैसा आएगा और मांग बढ़ेगी. इससे लोगों का डर और प्रताड़ना कम होगी. जानकारों का कहना है कि इससे लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा, मांग बढ़ेगी, निवेश बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी.
राजस्व की कहां से होगी भरपाई
सरकार करीब 7 लाख करोड़ रुपये का कॉरपोरेट टैक्स हासिल करती है. सरकार ने 99% कॉरपोरेट के लिए टैक्स 30 से घटाकर 25 फीसदी कर दिया है. इस टैक्स में अगर 2 फीसदी की भी बढ़त कर दी जाए तो पर्सनल इनकम टैक्स से होने वाले नुकसान के कुछ हिस्से की भरपाई हो जाएगी.
पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स यूपी चैप्टर के को-चेयरमैन और ग्लोबल टैक्सपेयर्स ट्रस्ट के अध्यक्ष मनीष खेमका कहते हैं, 'पर्सनल इनकम टैक्स को खत्म करने से लोगों के पास जो पैसा आएगा वे उसे कहीं न कहीं खर्च करेंगे, जिससे जीएसटी से आने वाला राजस्व काफी बढ़ जाएगा. इससे अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा. बहुत से छोटे व्यापारी, नौकरी पेशा लोग इसकी वजह से खुलकर काम या खर्च नहीं कर पाते. फाइव ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य तभी हो सकता है, जब करदाता की जोखिम लेने की क्षमता को हम बढ़ाएं. अभी बहुत से करदाता टैक्स की झंझटों की वजह से निवेश का जोखिम नहीं ले पाते.'
सामाजिक न्याय का एक तरीका है पर्सनल इनकम टैक्स
टैक्स एक्सपर्ट बलवंत जैन इस विचार से इत्तेफाक नहीं रखते कि पर्सनल इनकम टैक्स को खत्म किया जा सकता है. उनका कहना है कि व्यक्तिगत आयकर सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है और इसके बिना जनकल्याणकारी योजनाएं चलाना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा, 'मैं इसके खिलाफ हूं, इसकी दो वजह है- इक्विटेबल डिस्ट्रिब्यूशन का सामाजिक न्याय और दूसरी पारदर्शिता. इनकम टैक्स लोगों की कमाई की क्षमता के आधार पर लगता है. इसलिए यह इक्विटेबल डिस्ट्रिब्यूशन का जरिया है. सोशल जस्टिस और इक्विटेबल ड्रिस्टिब्यूशन होता है जिसमें अमीरों से लेकर गरीबों को दिया जाता है. दूसरे, यह एक तरह से सरकार के कंट्रोल का जरिया है. यह मालूम तो है कि कौन-सा पैसा कहां से आ रहा है, कहां जा रहा है? नहीं तो मनी लॉड्रिंग तो मनमाने तरीके से हो जाएगी.'
उन्होंने कहा, 'सरकार तमाम जनकल्याणकारी योजनाएं चलाती है, उसके लिए पैसा चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो सरकार के पास धन की मॉनिटरिंग या कंट्रोल का कोई जरिया ही नहीं रहेगा, उदाहरण के लिए रियल एस्टेट, बॉलीवुड में अगर बड़े पैमाने पर काला धन आता है उसका पता कैसे लग पाएगा? इस व्यवस्था से ट्रांसपैरेंसी है, सरकार को एक-एक आंकड़े पता होते हैं, वहां सरकार का कंट्रोल तो है. अगर इनकम टैक्स खत्म हुआ तो यह कंट्रोल ही खत्म हो जाएगा. जरूरी नहीं कि जो पैसा लोगों के पास आए वह खर्च ही ऐसा हुआ तो. बहुत से लोग गोल्ड और रियल एस्टेट जैसे बहुत से गैर जरूरी चीजों में खर्च करेंगे.'

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