टाइटेनिक (Titanic) जहाज आइसबर्ग (Iceberg) से टकराकर डूबा था, लेकिन उसकी वजह अंतरिक्ष (Space) में आए तूफान के कारण बनी थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
अपने समय का विश्व के सबसे बड़ा जहाज टाइटेनिक (Titanic) की घटना बहुत मशहूर है. माना जाता है कि यह जहाज एक आइसबर्ग (Iceberg) यानि बर्फ के विशाल टुकड़े से टकराकर 1500 लोगों सहित डूब गया था. इस जहाज के डूबने के बाद बहुत सारे अध्ययन हुए कई कहानियां लिखी गईं. बहुत सी सफल फिल्में टीवी शो भी बने. इसके डूबने (Sinking) के वास्तविक कारण जानने के लिए कई तरह की खोजें भी हुईं. ऐसे ही एक अध्ययन के मुताबिक टाइटेनिक के डूबने का कारण आइसबर्ग नहीं बल्कि अंतरिक्ष का मौसमी (Weather of Space) असर था.
क्या कारण बताया गया है
वेदर जर्नल में प्रकाशित इस नए अध्ययन में प्रमुख तौर से यह कहा गया है कि उत्तरी गोलार्द्ध उस रात को मध्यम से गंभीर मैग्नेटिक तूफान (Magnetic Strom) की चपेट में था. इसी तूफान ने वे बदलाव किए जिसके कारण टाइटेनिक का वह हश्र हुआ जिसकी किसी को शंका भी नहीं थी. टाइटेनिक की नेविगेशनल रीडिंग्स की वजह से उसके नियोजित रास्ते पर असर डाला.
तो क्या भूमिका है सूर्य की यहां
सूर्य एक बहुत ही शक्तिशाली आणविक डायनामो (Atomic Dynamo) है जिसमें सौर ज्वाला निकलती रहती हैं. इन ज्वालाओं से अंतरिक्ष मं बहुत शक्तिशाली मैग्नेटिक तरंगें पूरे सौरमंडल में फैल जाती हैं. सौरमंडल में घूमते हुए और बदलते हुए मैग्नेटिक फील्ड पर इन तरगों का बहुत अधिक असर होता है. लेकिन पृथ्वी की अपनी खुद की मैग्नेटिक फील्ड इन मैग्नेटिक तरंगों से यहां के जीवन की रक्षा करती है. इससे सूर्य से आने वाली खतरनाक मैग्नेटिक तरंगें हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पातीं वर्ना पृथ्वी मंगल ग्रह की तरह जीवनहीन हो जाता.
मैग्नेटिक फील्ड पर निर्भरता
पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड खुद परिवर्तनीय है. इंसान की लंबी यात्राएं इस मैग्नेटिक फील्ड पर काफी निर्भर रही हैं. कम्पास यानि कुतुबनुमान जैसा यंत्र हमेशा से उसे लंबी यात्राओं में सही दिशा बताने में मददगार रहा है जो कि मैग्नेटिक पोल या ध्रुव कि दिशा बताता है.

माना जा रहा है कि उस सौर सौर ज्वाला (Solar Flares) की वजह से अंतरिक्ष में मैग्नेटिक तूफान (Magnetic Storm) आया हो.
तब यह हुआ होगा
इस अध्ययन की लेखिका मिला जेन्कोवा की थ्योरी इसी मौसम और अंतरिक्ष के आंकड़ों पर है. उनका कहना है कि अगर उस रात सौर ज्वालाएं जिन्हें ऑरेर बोरियरिल के तौर पर पहचाना गया है, के प्रभाव से ही टाइटनेट और यहां तक कि उस समय के आसपास के और भी जहाजों के कम्पास पर असर हुआ होगा. इन कम्पास में एक डिग्री भी अंतर आने से बड़ा भटकाव पूरी तरह से मुमकिन है.
तो फिर बचाव कार्य क्यों नहीं हुआ प्रभावित
जेन्कोवो लिखती हैं कि जहाज की SOS हालात पर नजर जोसेफ बैक्शेल कर रहे थे. पैक्सहाल साइट अपने मूल लोकेशन से 24 किलोमीटर दूर थी. उस समय बचाव के लिए गया कार्पाथिया जहाज भी उस जियोमैग्नेटिक तूफान के प्रभाव में आ गया होगा और इस वजह से सभी उस इलाके में टाइटेनिक और कार्पाथिया की एक सी त्रुटियों की वजह से उनका समग्र तौर आपस के संचार पर असर नहीं हुआ होगा. जिससे बचे हुए लोगों का बचाव कार्य असफल नहीं रहा.

उस रात मैग्नेटिक तूफान (Magnetic Storm) की वजह से हो सकता है कि कम्पास (compass) सही तरह काम न कर सके हों.
मिली जुली प्रतिक्रियाएं
जेन्कोवो क थ्योरी को मिली जुली प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. कई लोगों का मानना है कि उस रात को ऑरेर बोरियरिल कई लोगों ने देखा था जिसमें टाइटेनिक से डूबने वालों में से बचे कुछ लोग भी शामिल थे. इसका मतलब साफ है कि उस समय अंतरिक्ष में किसी तरह की गतिविधि तो हुई ही थी. वहीं कई लोगों का कहना है कि ऐसा असर तो पूरी दुनिया में दिखाई देना चाहिए था जो कि नहीं हुआ.
कई विशेषज्ञों का कहना है कि जाहे जो भी हो, सौर ज्वाला और उससे उत्पन्न मैग्नेटिक तूफानों का पृथ्वी पर असर नहीं होता यह नहीं कहा जा सकता है. हमें केवल आने वाले समय के लिए बेहतर तैयारी करनी होगा यह जरूर है.

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