दिल्ली से भी विशाल बर्फ की चट्टान अंटार्कटिका से टूट समुद्र में पहुंची, जानिए, किन्हें है खतरा





अंटार्कटिका में मौजूद बर्फ की सबसे बड़ी चट्टान A68 (giant Antarctic iceberg) का एक टुकड़ा अलग होकर समुद्र में आगे खिसक रहा है. इस हिमखंड का आकार 5,800 स्क्वैयर किलोमीटर है. अब ये बर्फीला दानव दक्षिण जॉर्जिया की ओर बढ़ रहा है और विशेषज्ञ काफी चिंता में आ गए हैं. अगर ये इसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा तो समुद्री जीवों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है.

सबसे पहले तो ये समझते हैं कि बर्फ की ये विशाल चट्टान क्या है, जो सबको चिंता में डाले हुए है. लगभग 6000 स्क्वैयर किलोमीटर की ये चट्टान कोई मामूली चट्टान नहीं, बल्कि ये ठोस चट्टान देश की राजधानी दिल्ली से लगभग चौगुनी बड़ी है. या फिर इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि ये अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर से लगभग 7 गुना बड़ा है. अब जाहिर है, इतने बड़े हिमखंड के समुद्र में तैरने से इसका दुनिया के पर्यावरण पर बड़ा असर पड़ने वाला है.

सबसे परेशान करने वाली बात ये है कि अंटार्कटिक से बर्फ का टूटना भी पर्यावरण में बदलाव के कारण होता है. वैसे तो बर्फ का टूटना एक सामान्य प्रक्रिया है, जो होती रहती है. British Antarctic Survey (BAS) के मुताबिक ये एक प्राकृतिक घटना है और इसका क्लाइमेट चेंज से खास ताल्लुक नहीं. हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े हिमखंडों का टूटना क्लाइमेंट चेंज का ही नतीजा है.

हिमखंड के समुद्र में तैरने से इसका दुनिया के पर्यावरण पर बड़ा असर पड़ने वाला है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

बर्फ की चट्टान समुद्र की विशाल लहरों के साथ धीरे-धीरे आगे सरकती जाती है. इस बीच तूफान से इसके छोटे टुकड़े भी होते हैं. ऐसा ही इसके साथ भी हो रहा है लेकिन इस बीच सबसे बड़ा हिमखंड आगे ही बढ़ रहा है. इसी हिमखंड को A68a कहा गया, जो इसके असल नाम A68 से उपजा है. इसका आकार लगभग 2,600 स्क्वैयर किलोमीटर है यानी दिल्ली से लगभग दोगुना बड़ा.

अब बर्फ की ये चट्टान कई तरह से पर्यावरण पर असर डालने वाली है. अगर चट्टान किसी उथली यानी कम पानी वाली जगह पर रुक जाए तो इससे आसपास के समुद्री जीवों की मौत तय है. अब उथली जगह तो समुद्र के बीच कोई द्वीप हो सकती है. लिहाजा विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ये किसी द्वीप के पास रुकेगा और वहां की छोटी-बड़ी मछलियों और वनस्पति को खत्म कर देगा.

 

ये भी हो सकता है कि पेंगुविन और सील, जो खाने की तलाश में समुद्र में लंबी दूरियां तय करती हैं, वे इस चट्टान के कारण रास्ता भटक जाएं और अपने बच्चों के पास वापस न लौट सकें. इससे खाने की कमी से बच्चों की भी मौत हो सकती है.

हिमखंड के अलग हो जाने से वैश्विक समुद्री स्तर में 10 सेंटीमीटर की बढ़त हो जाएगी- सांकेतिक फोटो

इससे अलावा वैज्ञानिकों की मानें तो इस हिमखंड के अलग हो जाने से वैश्विक समुद्री स्तर में 10 सेंटीमीटर की बढ़त हो जाएगी. साथ ही इस हिमखंड के बीच में होने के कारण समुद्री जहाजों को भी मुश्किल हो सकती है. अगर चट्टान के कई टुकड़े पानी के नीचे बैठ जाएं तो पानी के ऊपर से दिखाई न देने के कारण जहाजों की दुर्घटना हो सकती है. बता दें कि समुद्र में हिमखंडों के कारण जहाजों की दुर्घटना कोई नई बात नही, बल्कि ऐसा कई बार हो चुका है. 'टिप ऑफ द आइसबर्ग' कहावत इसी दुर्घटना को देखते हुए बनी.

 

चट्टान के टूटने का असर दूसरे देशों ही नहीं, बल्कि भारत पर भी होने वाला है. समुद्री जलस्तर में बढ़ोत्तरी होने के कारण अंडमान-निकोबार के कई टापू पानी में डूब सकते हैं. साथ ही बंगाल की खाड़ी स्थित सुंदरबन पर भी डूबने का खतरा हो सकता है. हालांकि ये जल्दी नहीं होगा, बल्कि धीरे-धीरे चट्टान की बर्फ पिघलने पर होगा.

 

वैसे हिमखंड के टूटने का एक सकारात्मक असर भी होगा. इसके साथ थोड़ी धूल-मिट्टी भी होगी, जो समुद्र की लहरों के साथ तैरने वाले बेहद छोटे जंतुओं और वनस्पतियों को, जिन्हें प्लेंकटन कहते हैं, उन्हें खाद में बदल देगी. इस प्रक्रिया में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखी जाएगी. इससे प्रदूषण कुछ कम होगा.

Post a Comment

0 Comments