
मशहूर बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान का निधन हो गया है. उनके निधन से पूरी दुनिया में शोक की लहर है. उनके बचपन के मित्र, सहपाठी पड़ोसी आईपीएस और वर्तमान में भरतपुर एसपी हैदर अली जैदी ने अभिनेता इरफान खान का परिचय उनकी ही एक फ़िल्म हैदर के एक डायलॉग से देता हुए बताया है.
उन्होंने कहा कि इरफान खान को समझना है तो उनके फ़िल्म हैदर के उस डायलॉग को समझना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि
"दरिया भी मैं, दरख़्त भी मैं, झेलम भी मैं, चिनाब भी मैं,
देर भी हूं, हरम भी हूं, शिया भी हूं, सुन्नी भी मैं,
मैं हूं पंडित, मैं था, मैं हूं, मैं रहूंगा."
एसपी जैदी ने बताया है कि यह डायलॉग काफी है इरफान खान को समझने के लिए. उन्होंने बताया कि इरफ़ान जैसे न कभी पैदा हुए और न कभी पैदा होंगे. उनकी जिंदगी पूरी फिल्म की तरह जहन में है. उनके जोक्स, उनकी बातें यकीन नहीं होता कि इरफान अब इस दुनिया में नहीं रहे. वह कम बोलते थे लेकिन उनकी आंखें बोलती थी. बचपन से लेकर जवानी तक के बहुत से ऐसे किस्से हैं, जिनको जुबां से बता पाना मुश्किल है. इरफान के बचपन के दोस्त हैदर अली जैदी के साथ बचपन से लेकर जवानी तक का सफर साथ तय किया और वह एक मशहूर एक्टर बने और हैदर अली जैदी बन गए ब्यूरोक्रेट.
आईपीएस हैदर अली जैदी ने बताया है कि मुझे यकीन नहीं होता है कि इरफ़ान इस दुनिया मे नहीं रहा. आज सुबह 11.30 बजे इरफान के भाई इमरान का फोन आया उन्होंने बताया कि अभी सूचना मिली है कि भाईजान नहीं रहे. अब आप ही हमारे लिए इरफ़ान हो. यह कहते हुए फोन पर वह बिलख पड़ा. बरबस मेरी आंखें भी टमटमा गई. मेरा गला भी रुंध आया. एक फ़िल्म जहन में घूमने लगी. कैसे मैं और इरफान स्कूल अलग-अलग होने के बाद भी एक साथ स्कूल जाते और स्कूल के बाद भी साथ-साथ रहते थे.
कुछ यूं याद की एक-एक बात
इरफान जयपुर के सुभाष चौक में रहता था और मैं खवास जी के रास्ते में. वो सेंट पॉल स्कूल में पढ़ता था और मैं सैंट जेवियर्स में. हम दोनों साथ खेलते और साथ ही स्कूल पढ़ने जाते. फिर हमने कॉलेज की पढ़ाई भी साथ-साथ की. दोनों ने राजस्थान कॉलेज में दाखिला लिया और उसके बाद यूनिवर्सिटी भी साथ ही पढ़ने चले गए. उसने उर्दू में एमए की. उस वक्त मेरे पिता डॉक्टर मोहम्मद अली जैदी उर्दू डिपार्टमेंट के 'हेड ऑफ द डिपार्टमेंट' थे. उसने उर्दू में एमए किया और मैंने इकोनॉमिक्स में. एमए के दौरान ही इरफान का झुकाव थिएटर की तरफ हो गया और उसने यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान के ड्रामेटिक्स डिपार्टमेंट में दाखिला ले लिया. एक-डेढ़ साल में उसने डिप्लोमा किया और इसी बीच दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में उसका दाखिला हो गया. इस दाखिले से वो इतना खुश था कि मानों सारी कायनात उसकी झोली में आ गिरी हो.
उनके पिता की चांदी की टकसाल के पास टायरों की दुकान थी. उनके पास एक जीप थी, जिसको उन्होंने मॉडिफाई कर रखा था और उसे कैरोसिन से चलाते थे. सिर्फ स्टार्ट करने के लिए पेट्रोल डाला करते थे. उस समय इरफान हंस कर कहता था कि देख हैदर भाई हम जीप को भी बेवकूफ़ बना रहे हैं. उनके वालिद सब बच्चो को जीप में भर कर आमेर घुमाने ले जाया करते थे.
करंट लगने पर इरफान ने बचाई थी जान
और भी न जाने कितनी ही यादें हैं, जो एक-एक करके तस्वीर की तरह आंखों के सामने से घूम रही है. एक बार रोडवेज के एक विद्युत पोल से मुझे करंट लग गया था. हम सब दोस्त साथ थे. इरफान भी साथ था और सब लोग भाग गए लेकिन इरफ़ान ने अपने प्लास्टिक के कैनवास के जूते से मुझे तार से अलग कर छुड़ाया मेरी जान बचाई. मुझे पानी पिलाया और कहा था कि मियां हम हैं तो क्या गम है. ऐसे ही एक किस्सा मकबूल फ़िल्म से जुड़ा है. फ़िल्म मकबूल को देखने के लिए उसने मुझे कहा और जब मैं पत्नी के साथ फ़िल्म देखने थियेटर में गया तो वह हर सीन को देखने पर फोन कर पूछता कौन सा सीन अच्छा है. सबसे अच्छा है मेरी पत्नी राना जैदी के लिए पूछता रहा, भाभी को कौन सा सीन सबसे अच्छा लगा?
इरफान खान को था पतंग बाजी का शौक
आगे उन्होंने बताया कि उसको पतंग बाजी का बहुत शौक था. हर बार मकर सक्रांति पर वह जयपुर आता था तो हम साथ मे पतंग उड़ाया करते थे. वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहा. कभी उसने अपने आपको जड़ों से कटने नहीं दिया. जब उसका नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में सेलेक्शन हुआ था, उस रात वह उनके पास आया था. घर से आवाज देकर नीचे बुलाया और बताया कि वह सुबह 5 बजे चला जाएगा.
दिसंबर 2018 में जब मुझे इरफान की बीमारी का पता चला तो मैं इंग्लैंड चला गया. सात-आठ दिन हम दोनों साथ रहे. उसने कभी महसूस ही नहीं दिया होने दिया कि वह एक बड़ी लड़ाई लड़ रहा है. उसकी आंखें बोलती थी लेकिन वह कभी भी नहीं बोलता. वह हर वक्त यही बोलता कि हैदर तुम वहां हो आओ, बहुत अच्छी जगह है. उस रेस्टोरेंट पर हो आओ, वहां पर टर्किस फ़ूड बहुत अच्छा मिलता है, उसे टेस्ट करो. फलां जगह घूम कर के देखो, बहुत खूबसूरत है. वह उस हाल में भी हर वक्त गाइड करता रहता. कभी बताता ही नहीं, ऐसी चीज ही नहीं करता कि आपको तकलीफ हो. आपको उसकी तकलीफ का अहसास हो. उसकी आंखें बेशक बोलती लेकिन वह नहीं. ही वाज वेरी इंटेंस पर्सन. उसके हाथ की हड्डी टूट गई थी. हाथ थोड़ा टेढ़ा जुड़ गया था लेकिन उस हाथ से वह जबदस्त बॉलिंग करता था. उसने अपनी कमजोरी को अपना हथियार बना लिया.
बचपन में हम जयपुर के जोरावर सिंह गेट के पास आयुर्वेदिक ग्राउंड में क्रिकेट खेला करते थे. बहुत ही बढ़िया क्रिकेटर था वह. उसका फर्स्ट क्लास क्रिकेट के लिये सीके नायडू टूर्नामेंट में इमर्जिंग क्रिकेटर के बतौर सलेक्शन हुआ. फंड की वजह से जा नहीं पाया पर उसने अफसोस नहीं किया. अलग राह चुनी, अलग पहचान बनाई.
मां का बहुत प्रभाव था इरफान पर
इरफान अपनी मां सईदा बेगम से बहुत मुतमईन था. मां का इरफान पर बहुत प्रभाव था. अभी चार दिन पहले वह मां भी चल बसी और आज उसका लाडला इरफान भी. वह देख भी नहीं पाया आखिरी घड़ी अपनी उसी मां को, जो हर वक्त उसे एक ही बात कहती रही-" इरफान तुम वापस चले आओ. लेक्चरर बन जाओ और मेरे पास रहो. जब भी मैं मिलता, इरफान की मां एक ही शिकायत करती -"हैदर मियां, वह चला गया. मैं तो चाहती थी कि वह यहीं रहे, लेक्चरर बन जाए, बच्चों को अच्छी तालीम दे और मेरे साथ रहे. विडंबना देखो चार दिन पहले वह मां चली गई और आज उसका लाडला इरफान.
इरफान की सेहत के लिए खूब की दुआएं
पिछले छह-सात दिन से वो (इरफान खान) अस्पताल में था. आईसीयू में था. मैं कोरोना संक्रमण के इस दौर में भरतपुर में लॉकडाउन को हर सूरत में सफल बनाए रखने की कवायद में बतौर पुलिस अधीक्षक (एसपी) लगा रहता हूं और जब भी वक्त मिलता मन ही मन मेरे उस दोस्त के लिए दुआएं करता था. मुझे पक्का यकीन था कि खुदा उस पर पहले की तरह रहम करेगा और वो इससे निकल आयेगा. वर्ष 2018 में भी तो वो अपने जज्बे और खुदा की मेहर से उस खतरनाक बीमारी से जूझकर बाहर निकल आया था. ज्यों ही उसके हम सबसे जुदा हो जाने की खबर मिली, बचपन से लेकर अब तक की हर याद जेहन में छाई चली जा रही हैं.
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