उस समारोह में आखिर क्यों नहीं आए राहुल गांधी



लेखक: राजदीप सरदेसाई।।
2009 आते-आते राहुल गांधी राष्ट्रीय राजनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे। यह अलग बात थी कि तब तक अमेठी के बाहर वोट लाने की क्षमता की कोई मिसाल साबित नहीं हुई थी। 2004 में कांग्रेस के पोस्टर में सिर्फ सोनिया दिखती थीं लेकिन 2009 आते-आते इसमें राहुल और मनमोहन सिंह भी जुड़ गए। इस समय तक राहुल का आत्मविश्वास भी बढ़ गया था। वह मुझे मुंबई में चुनाव प्रचार के दौरान मिले और मजबूती से कहा- हम जीत रहे हैं और अच्छे तरीके से जीत रहे हैं। 1984 के बाद पहली बार कांग्रेस ने अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए 206 सीटें हासिल की थीं। उस जीत का क्रेडिट कांग्रेस ने राहुल गांधी को दिया। परिणाम के दिन जो भी नेता टीवी स्टूडियो में आए, जीत के लिए राहुल के नेतृत्व को सबसे अहम योगदान देने वाला बताया।

खासकर उत्तर प्रदेश में 21 सीटों पर मिली जीत को राहुल के युवराज के रूप में उभरने का सबसे बड़ा सबूत माना गया। तभी लगभग हर कांग्रेस नेता कहते- बस एक-दो साल की बात है, मनमोहन सिंह की जगह राहुल ले लेंगे। वहीं पार्टी में दूसरा समूह ऐसा था जो चाहता था कि पहले राहुल मनमोहन सरकार में बतौर मंत्री शामिल हों। इनकी चाहत थी कि या तो एचआरडी या ग्रामीण विकास मंत्रालय का प्रभार राहुल संभालें। इन दोनों से जुडे मसलों में राहुल रुचि ले रहे थे। लेकिन राहुल ने सपाट तरीके से इस प्रस्ताव को मना कर दिया। तब उन्होंने कहा कि उनका अभी एकसूत्री अजेंडा है यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई को जीवित करना। ऐसा नहीं है कि तब सिर्फ कांग्रेस के अंदर राहुल गांधी की तारीफ हो रही थी। मीडिया के अंदर भी राहुल गांधी को लेकर उम्मीदें बन रही थीं। तब हमारे चैनल के इंडियन ऑफ दि इयर का पुरस्कार राजनेता कैटिगरी में राहुल गांधी को दिया गया था।

बाद में अहसास हुआ कि हम सब गलत थे। यह सही था कि राहुल ने बहुत मेहनत की थी। यह भी सही था कि गांधी परिवार ने यूपी में कांग्रेस को एसपी-बीएसपी का राष्ट्रीय विकल्प बनने में मदद की। लेकिन 2009 में जीत का असली क्रेडिट मनमोहन सिंह को जाना चाहिए था। खैर, इंडियन ऑफ दि इयर का अवॉर्ड शो जिस दिन था उस दिन सभी अतिथि आए। खुद पीएम मनमोहन सिंह भी थे। ए आर रहमान, साइना नेहवाल सहित जिसे भी सम्मान मिलना, वे सभी उपस्थित थे। लेकिन राहुल नहीं आए। हमने उनसे पिछले कई दिनों से आग्रह किया था कि वे जरूर आएं। उनकी बहन प्रियंका से भी कहा कि वे राहुल से आग्रह करें कि वह जरूर आएं। यह भी कहा कि जब पीएम मनमोहन सिंह खुद मौजूद रहेंगे तब राहुल का नहीं आना अच्छा नहीं लगेगा। जिस दिन अवॉर्ड शो था, उस दिन राहुल दिल्ली में थे लेकिन नहीं आए। क्यों नहीं आए? प्रियंका ने कहा कि राहुल पुरस्कार में विश्वास नहीं करते। या ऐसा तो नहीं कि राहुल को अहसास हो गया था कि वे पुरस्कार के पूरी तरह हकदार नहीं थे?

अबूझ पहेली थीं वह
मैं मायावती से पहली बार 1994 में मिला। तब मैं दिल्ली में नया-नया था और भीमराव आंबेडकर की लेखनी पर रिसर्च कर रहा था। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम आंबेडकर के बहुत बड़े प्रशंसक थे। मैंने कांशीराम के साथ आंबेडकर की सोच और विरासत पर कई मौकों पर लंबी चर्चा की। ढीले-ढाले उजले शर्ट, गले में तौलिया और बेतरतीब पैंट में दिखने वाले कांशीराम सीधी बात करने वाले राजनेता थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, ‘आंबेडकर को तो महाराष्ट्र में मूर्तियों तक सीमित कर दिया गया,उन्होंने उनकी विरासत को उत्तर प्रदेश में जिंदा रखा है और उसे आगे ले जाने की हर कोशिश कर रहे हैं।’

हुमायूं रोड स्थित उनके घर पर हम दोनों की बातचीत के बीच तब चाय लेकर मायावती ही आती थीं। वह तब तक उत्तर प्रदेश में नेता बन चुकी थीं। कांशीराम मायावती के बारे में हमेशा कहते कि वह एक दिन राज करेगी। वह बिल्कुल सही थे। मैं जून 1995 में लखनऊ में था जब मायावती देश की पहली महिला दलित के रूप में सीएम पद की शपथ ले रही थीं। शपथ से ठीक पहले मायावती पर एसपी के कार्यकर्ताओं ने हमला किया था जिसे स्टेट गेस्ट हाउस कांड के नाम से जाना जाता है। मायावती ने मुलायम सिंह यादव से समर्थन वापस लिया था। बाद में जब मैंने मायावती से इंटरव्यू किया और इस वाकये का जिक्र हुआ तो उन्होंने कहा, ‘वे मेरा मर्डर करना चाहते थे। इनको कभी नहीं छोड़ूंगी। इनको सबक सिखाना पड़ेगा।’ अगले दो दशक तक मायावती आक्रामक राजनीति करती रहीं। उनकी राजनीति के बारे में पहले से अनुमान लगाना मुश्किल था। वे सभी के लिए अबूझ पहेली सी रहीं। बतौर सीएम वह लॉ एंड ऑर्डर पर सख्त रहीं लेकिन जयललिता की तरह करप्शन के आरोपों से घिरी रहीं।

जमीन खिसकने का अहसास
मैं उनसे उनके आवास पर एक बार उनसे मिला। कुछ हफ्ते पहले ही बीएसपी कार्यकर्ताओं ने हमारे ओबी वैन को तोड़ दिया था। वे मायावती की अघोषित संपत्ति पर हमारे चैनल की स्टोरी से नाराज थे। मुझे आग्रह से मायावती ने लिमका और काजू खाने को कहा। इसके बाद वह मीडिया पर बरस पड़ीं। बोलीं, ‘आप लोगों को शर्म आनी चाहिए। कुछ भी दिखाते हो अनाप-शनाप।’ उनकी बातों में तनिक भी अफसोस नहीं था कि उनके कार्यकर्तओं ने किस तरह हमारे चैनल के साथ तोड़-फोड़ की थी। जब हम बातचीत कर रहे थे तो सीनियर अधिकारी उनके सामने खड़े थे। डरे हुए। किसी में मायावती की ओर सीधे देखने तक की हिम्मत नहीं लग रही थी। जनवरी 2014 में मायावती को एक पुराने केस ने फिर परेशानी में डाला। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कमाई से अधिक संपत्ति के मामले में जांच शुरू करने का रास्ता खोल दिया। तभी खबर आई कि मायावती केस से बचने के लिए कांग्रेस से कोई डील कर रही हैं। तब राहुल गांधी ने कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन नहीं होने दिया। उस साल आम चुनाव में अमित शाह ने मुझसे कहा कि इस बार बीएसपी बैठ गई है। चुनाव ही नहीं लड़ रही है। वह सही थे। पिछले बीस सालों में बीएसपी का इतना ठंडा और दिशाहीन चुनावी कैंपेन मैंने नहीं देखा था। मायावती को भी अहसास हो चुका था कि उनकी जमीन खिसक रही है। यह जमीन बचाने की कोशिश उन्होंने आम चुनाव से अधिक 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में की।

(राजदीप की पुस्तक ‘द इलेक्शन, दैट चेंज्ड इंडिया’ से साभार)


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