
‘तेते पांव पसारिए, जेती लांबी सौर’
ये पुरानी कहावत है. स्कूल में बहुत पढ़े होंगे. मतलब ये कि पैर उतना ही फैलाओ, जितनी बड़ी चादर हो. क्षमता के अनुरूप ही अपने तैयरियों को विस्तार दो. कक्षा 5-6 की किताब में लिखी इस कहावत को उर्जित पटेल दुहरा रहे हैं. रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर. उन्होंने आज . अंग्रेज़ी के अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में. कोरोना के फैलते संक्रमण के बीच सरकार की तैयारियों पर बात की है. कहा है कि सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था की क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही कोरोना से लड़ाई करनी होगी.
उर्जित पटेल ने शुरुआती तौर पर सरकार जिस तरह से डील कर रही है, उसकी सराहना की है. और कहा है कि सरकार को कोरोना से लड़ाई में और ज़्यादा संसाधन लगाने की ज़रूरत है. क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग से हम एक और लॉकडाउन से देश को बचा सकेंगे. साथ ही लोकल लेवल पर छोटे-छोटे लॉकडाउन न हों, इस स्थिति से भी बचा जा सकेगा.
पूरी बात जानिए
क्या कहा उर्जित पटेल ने? कहा,
“हमारी जनसंख्या देखते हुए हम जिस गति से कोरोना की टेस्टिंग कर रहे हैं, वो बहुत ही कम है. आगे आने वाले हफ़्तों में जब सरकारों को कठिन निर्णय लेने होंगे, उस समय हम अंधे न हो जायें और सही आंकड़े उपलब्ध हों, इसके लिए सरकार को टेस्ट का पूरा ख़र्च उठाना चाहिए. ज़ाहिरा तौर पर इसका फ़ायदा होगा. स्वास्थ्य के हलके और आर्थिक हलके, दोनों में ही ज़्यादा विश्वसनीय आंकड़े हमारे सामने आयेंगे. विश्वसनीय आंकड़ों से आत्मविश्वास बढ़ेगा. ग़लत आंकड़ों से अनिश्चितता बढ़ेगी, और आर्थिक संकट से उबरने में मदद भी नहीं मिलेगी.”
इसके बाद उर्जित पटेल ने उभरती मार्केट इकॉनमी का ज़िक्र किया है. कहा है कि जो अर्थव्यवस्थाएं उभर रही हैं, वे शायद ही वैसे क़दम उठा सकती हैं, जैसे क़दम अमरीका, ब्रिटेन या जर्मनी ने उठाए हैं. इन देशों ने, भले ही थोड़े समय के लिए, लेकिन अपने नागरिकों के प्रति उदारता दिखाई है. इसमें इन देशों के केंद्रीय बैंकों का अभूतपूर्व सक्रियता भी कारगर रही है. कहा है कि जो देश संकट के समय रिज़र्व करेंसी जारी कर सकते हैं, उनके पास कुहनी फैलाने की ज़्यादा जगह होती है. मतलब? मतलब ये कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं के पास संसाधनों का इस्तेमाल करने की ज़्यादा छूट होती है. सीमाएं कम होती हैं. इसके बाद उन्होंने कहा है,
“भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के पास ऐसी छूट नहीं है. जैसा विकसित देशों ने किया, वैसा भारत नहीं कर सकता है. हमें हर हाल में अपनी आर्थिक सीमा को ध्यान में रखना ही होगा.”
कहा है कि भारत ने अपने राजकोषीय घाटे का आकलन सही किया है. घाटा बहुत ज़्यादा होने वाला है. और अगर ख़र्च नहीं बढ़ता है, तो भी राजकोषीय घाटा बढ़ता जाएगा. पहले तो सरकार की कमाई घटेगी और दूसरा ये कि भारत के राज्य, जिन पर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का भार है, उन पर दबाव बढ़ेगा.
उर्जित पटेल ने भारत के बैंकिंग सेक्टर पर भी चिंता ज़ाहिर की है. कहा है कि निवेशकों के आत्मविश्वास की वजह से बैंकिंग सेक्टर प्रभावित होगा. आने वाले हर तरह की अर्थव्यवस्था में NPA (नॉन पर्फ़ॉर्मिंग ऐसेट्स) की संख्या बढ़ेगी. उर्जित पटेल ने ये भी कहा है कि,
“भविष्य में किसी मौक़े पर अन्तर्राष्ट्रीय निवेशक तमाम देशों के बीच अंतर करना शुरू करेंगे. कैसे? इस आधार पर कि इन देशों ने ख़ुद के यहां किस तरीक़े से इतने बड़े हेल्थ चैलेंज को हैंडल किया है. और साथ ही इससे ये भी निर्धारित होगा कि अर्थव्यवस्थाएं कितनी तेज़ी और कितनी मज़बूती से वापिस अपने पैरों पर खड़ी होती हैं. इससे अर्थव्यवस्था की एक और लहर सामने आ सकती है, जिसके लिए हमें तैयार रहना होगा.”
मतलब RBI के पूर्व गवर्नर कह रहे हैं कि कोरोना से तो सम्हलकर लड़ना तो होगा, अर्थव्यवस्था को भी देखना होगा. लेकिन साथ में एक ख़ास बात का भी ध्यान रखना होगा. बात ये कि हम कोरोना से कैसे लड़े? इस पर हमारी पूरी अर्थव्यवस्था टिकी हुई है.
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