शुमार महेंद्र सिंह धोनी के कुछ ऐसे मंत्रा हैं, जो हमें असल जिंदगी में बहुत कुछ सिखाते हैं




1. सकारात्मक सोच
अभी तक के उनके सारे मैचों पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक बात साफ है कि चाहे वो टीम इंडिया के कप्तान रहे हो या फिर चेन्नई सुपर किंग्स की कप्तानी करते रहे हों, हर परिस्थिति में उनकी टीम की जीत का प्रतिशत ज्यादा रहा है. कम स्कोर वाले मैचों में भी वो कूल बने रहे. परिस्थितियों के लिहाज से रणनीतियां बदलीं. आईपीएल के मौजूदा सीजन के क्वालिफाय़र वन मैच में जब ये लगने लगा था वो हार के करीब हैं, तब भी अपने डगआउट में शांत नजर आ रहे थे. उन्होंने आखिरी ओवरों के लिए एक ऐसे खिलाड़ी दीपक चहर को बैटिंग करने भेजा, जो पारंपरिक बल्लेबाज नहीं है. उसने आते ही तस्वीर बदल दी. चेन्नई ने हारा हुआ मैच जीत लिया.


2. टैलेंट पूल की समझ-
इस आईपीएल में कमेंटेटर्स ने कई बार कहा कि धोनी ऐसे कप्तान हैं जो खिलाड़ियों को तलाशते ही नहीं हैं बल्कि तराशते भी हैं. वो अक्सर एकदम नए खिलाड़ियों पर भरोसा दिखाते हैं, उसमें आत्मविश्वास पैदा करते हैं और वो शानदार खेल दिखाने लगता है. कई बार उनकी इसलिए आलोचना हुई कि कुछ खिलाडिय़ों को लेकर वो अडियल हो जाते हैं. समय के साथ उन्होंने साबित कर दिया कि उन्हें खिलाडिय़ों की योग्यता की पहचान है. उसी हिसाब से अपनी रणनीति और मैचों में वो खिलाडिय़ों को फिट करते हैं या मौका देते हैं.

3. कूल रहो
ये हमेशा से उनका मूलमंत्र रहा है कि मैदान के बाहर और अंदर तनाव और दबाव को कभी हावी मत होने दो. टीम इंडिया मैदान पर उनकी कप्तानी के दौरान रिलैक्स नजर आती थी. उसी तरह अब चेन्नई सुपर किंग्स का हाल है. मैदान पर तनाव लाना उन्हें अभी पसंद नहीं.

4. टीम के असल बॉस बनें
वर्ष 2011 में मुंबई के वर्ल्ड कप फाइनल मैच से एक दिन पहले धोनी जब मीडिया से मिलने आये तो उन्होंने एक गौरतलब बात कही कि उन्होंने टीम के अलग अलग विभागों का विकेंद्रीकरण किया हुआ है. हर विभाग का अपना एक बॉस है. जो रणनीतियां तय करता है और फिर उनके साथ डिस्कस करता है. लिहाजा वो टीम के हर डिपाटमेंट के साथ इनवाल्व भी होते हैं और उन्हें पर्याप्त स्पेस भी देते हैं.

5. खराब प्रदर्शन करने वालों के साथ खड़े रहो
ये उनका हमेशा का फंडा है. हालांकि इसकी भी आलोचनाएं हो चुकी हैं लेकिन उनके बारे में माना जाता रहा है कि वो ऐसे कप्तान हैं जो सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी के साथ खड़े रहते हैं और उसे मौका देते हैं, उसका उत्साह बढ़ाते हैं.

6. धैर्य का मतलब यथास्थितिवादी होना नहीं
आतुरता, बेताबी तुरत फुरत रिजल्ट जैसे शब्द शायद उनकी डिक्शनरी में हैं नहीं. वो धैर्य के साथ मैदान में रणनीति के क्रियान्वयन का इंतजार करते हैं. दबाव के क्षणों में खिलाडिय़ों को आपा नहीं खोने के लिए कहते हैं. हालांकि उनके आलोचक कहते हैं कि उन्हें खुद हालात बदलने की पहल करने वाला कप्तान बनना चाहिए.

7. हमेशा सीखो
इसमें कोई शक नहीं कि वो हमेशा सीखते हैं, मेहनत उनका मूलमंत्र है. वो अपनी जमीन हमेशा पकड़े रहते हैं. उनके सीखने और मेहनत करने की प्रवृत्ति उनकी टीम को ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करती है. 36 साल की उम्र में भी वो जिस तरह एक विकेटकीपर के रूप में लगातार विकेट के पीछे एक्टिव दिखते हैं, वैसा बहुत कम खिलाड़ियों के बूते की बात है.

8. सटीक फैसला लेने वाले
आईपीएल में डीआरएस लेने से पहले ये सुनिश्चित करना भी जरूरी होता है कि जो डीआरएस आप ले रहे हों वो सही बैठे. क्योंकि एक टीम को एक मैच के दौरान एक ही डीआरएस मिलता है. अगर आपने इसे सही तरह से नहीं भांपा तो ये एक मौका बेकार चला जाएगा. इसलिए कप्तान की खूबी इसमें भी है वो डीआरएस का फैसला लेने को लेकर कितना सटीक है. धोनी के डीआरएस लेने के फैसले 99 फीसदी सही बैठे हैं. इसलिए मजाक में लोग डीआरएस को डिसिजन रिव्यू सिस्टम की बजाए धोनी रिव्यू सिस्टम कहने लगे हैं. वैसे भी क्रिकेट मैदान पर वो जो भी फैसले लेते हैं, वो आमतौर पर सही ही बैठते हैं. माना जाता है कि स्थितियों को एनालाइज करने के लिए उनके पास जबरदस्त दिमाग है.

9. प्रेरित करने वाले
फिनिशर के तौर पर धोनी जिस तरह बैटिंग करते हैं और टीम को 90 फीसदी मामलों में जीत तक पहुंचाते हैं, उससे वो अपने खिलाड़ियों को भी प्रेरित करते हैं कि वो भी अच्छा खेल दिखाएं.


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